मकर संक्रांति पर दान का विशेष महत्व: परंपरा से आत्मशुद्धि तक
मकर संक्रांति भारत के प्रमुख पर्वों में से एक है। इस दिन से सूर्य उत्तर की ओर बढ़ता है, जिसे उत्तरायण कहा जाता है। इसे आमतौर पर सूर्य के मकर राशि में प्रवेश, उत्तरायण की शुरुआत, पतंग उड़ाने और तिल–गुड़ के व्यंजनों से जोड़ा जाता है। लेकिन इन बाहरी उत्सवों के पीछे एक गहरा आध्यात्मिक संदेश छिपा है—दान और आत्मशुद्धि का संदेश।
मकर संक्रांति भारत का ऐसा पर्व है जो प्रकृति, जीवन और आत्मचिंतन—तीनों से जुड़ा हुआ है। उत्तरायण का समय हमारे शास्त्रों में शुभ और सकारात्मक ऊर्जा से जुड़ा हुआ माना गया है। यह पर्व हमें केवल कुछ देने की परंपरा नहीं सिखाता, बल्कि यह समझाता है कि क्यों दान देना आवश्यक है और कैसे दान हमारे भीतर परिवर्तन लाता है।
मकर संक्रांति का मतलब है—एक दिशा से दूसरी दिशा की ओर जाना। जैसे सूर्य अपनी दिशा बदलता है, वैसे ही यह पर्व हमें भी प्रेरित करता है कि हम अपने जीवन में नकारात्मक सोच छोड़ें अच्छे कर्मों की ओर बढ़ें|
मकर संक्रांति 2026: तिथि और शुभ संयोग
हिंदू पंचांग के अनुसार, मकर संक्रांति का पर्व 14 जनवरी 2026, बुधवार को मनाया जाएगा। इसी दिन ‘षटतिला एकादशी’ का संयोग भी बन रहा है, जो दान, पुण्य और आत्मशुद्धि के लिए शुभ माना जाता है। इस दिन किया गया दान अन्य दिनों की तुलना में अधिक पुण्यदायक होता है | षटतिला एकादशी का नाम “षट”(छह) और “तिला” (तिल) से बना है। इस दिन दान और उपवास से पाप नष्ट होते हैं। इस दिन तिल और उससे बने व्यंजन या दान को विशेष पुण्य माना जाता है।
ज्योतिषीय दृष्टि से भी यह मकर संक्रांति विशेष मानी जा रही है। इस दिन चंद्रमा वृश्चिक राशि में स्थित होंगे, जिससे पर्व का महत्व और बढ़ जाता है। मकर संक्रांति के दिन दान, स्नान और पूजा का महत्व सूर्य के मकर राशि में प्रवेश से जुड़ा होता है। इसलिए दान प्रातःकाल या दिन के समय करना शुभ माना जाता है|
मकर संक्रांति पर दान क्यों विशेष माना जाता है?
मकर संक्रांति फसल और परिश्रम से जुड़ा पर्व है। ऐसे समय में दान करना हमें यह याद दिलाता है कि— जो कुछ हमें मिला है, वह केवल हमारी मेहनत से नहीं है, प्रकृति, समाज और ईश्वर का भी योगदान है| इसलिए इस दिन दान करना कृतज्ञता प्रकट करने का एक सुंदर माध्यम माना जाता है।
इस दिन कुछ विशेष चीज़ों का दान करने की परंपरा है, जैसे —
• तिल – जो कठिन समय में भी मजबूती का प्रतीक है
• गुड़ – जो मिठास और अच्छे संबंधों का संकेत देता है
• अन्न – जीवन का आधार
• वस्त्र – सम्मान और सुरक्षा का प्रतीक
इन वस्तुओं का दान हमें दूसरों की आवश्यकताओं के प्रति संवेदनशील बनाता है।
दान और कर्म का संबंध
आम धारणा में दान का अर्थ है—कुछ वस्तुएँ देना। लेकिन आध्यात्मिक दृष्टि में दान का अर्थ है— अपने भीतर के अहंकार, संग्रह और आसक्ति को कम करना। दान केवल धन या वस्तु का नहीं होता, बल्कि भाव का होता है। यदि दान दिखावे, अपेक्षा या अहंकार से किया जाए, तो उसका प्रभाव सीमित रह जाता है। लेकिन जब दान निस्वार्थ भाव से किया जाता है, तो वह केवल कर्म नहीं रहता, बल्कि आत्मिक शुद्धि का साधन बन जाता है। ऐसा दान मन में संतोष और शांति लाता है।
मकर संक्रांति के दिन दान का संदेश यह है कि बांटने से जीवन में समृद्धि आती है। परंपरा से ऊपर उठकर, यह हमें यह सिखाता है कि जीवन एक साझा यात्रा है—जहाँ हम अपने सुख और संसाधन दूसरों के साथ बाँटते हैं, वहीं हम अपनी आत्मा को भी जगाते हैं।
दान का अर्थ केवल “देना” नहीं, बल्कि जीवन को एक सकारात्मक दिशा देना है। आज के समय में दान का अर्थ केवल वस्तुओं तक सीमित नहीं है। कई बार सहानुभूति और समझ भी बहुत बड़ा दान होती है।
गीता में बताया गया है कि संयमित कर्म और निस्वार्थ भाव जीवन में शांति लाते हैं। मकर संक्रांति का दान इसी शिक्षण को जीवन में अपनाने का अवसर है।
दान से आत्मशुद्धि
मकर संक्रांति पर दान कोई औपचारिक रस्म नहीं, बल्कि अपने भीतर बदलाव लाने का अवसर है। जब हम दान को केवल परंपरा नहीं, बल्कि आत्मचिंतन और करुणा से जोड़ते हैं, तब इस पर्व का वास्तविक अर्थ सामने आता है।
ऐसे पर्व हमें केवल बाहरी परंपराएँ नहीं सिखाते, बल्कि भीतर की यात्रा की ओर भी संकेत करते हैं—जहाँ आत्मचिंतन और जीवन के मूल्यों को समझने के लिए 'BLISS' जैसे मंच मार्गदर्शन का माध्यम बन सकते हैं।
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